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कुर्सी एक और यूपी में मुख्यमंत्री बन गए दो, मायावती का दिमाग जब हो गया था फेल

Tuesday, July 20, 2021 | Tuesday, July 20, 2021 WIB

भारत का संविधान भी यह कहता है कि किसी भी राज्य में एक समय पर सिर्फ एक ही मुख्यमंत्री रह सकता है. लेकिन उत्तर प्रदेश में एक बार ऐसा भी हो चुका है जब एक साथ दो लोग मुख्यमंत्री पद पर बैठे थे. दो मुख्यमंत्री बनाने में मायावती का पूरा दिमागी खेल था.



 खुल मुख्यमंत्री पद पर रह कर मलाई खाने के बाद एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया. जिसके वजह से लखनऊ से लेकर दिल्ली तक इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचने के बाद सुलझा था. तो चलिए आपको तफ्सील से बताते हैं कि उस वक्त आखिर हुआ क्या था?


यह 1998 का साल था और फरवरी का महीना था. देश में 12वीं लोकसभा के लिए चुनाव चल रहे थे और सभी पार्टियां चुनाव प्रचार में लगी थीं. रोमेश भंडारी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे और लखनऊ का विशाल राजभवन उनका आशियाना हुआ करता था. 21 फरवरी 1998 की तारीख थी जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह चुनाव प्रचार के सिलसिले में गोरखपुर में थे. 

उसी दरम्यान मायावती लगभग 2 बजे अपनी पार्टी बसपा, अजीत सिंह की किसान कामगार पार्टी और जनता दल के विधायकों और सरकार का समर्थन कर रहे लोकतांत्रिक कांग्रेस के विधायकों के साथ राजभवन राज्यपाल रोमेश मंडारी के पास पहुंच गईं.


मायावती ने राज्यपाल रोमेश भंडारी से कहा कि ये सभी विधायक कल्याण सिंह सरकार के ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर जगदंबिका पाल का समर्थन करते हैं. इसलिए आप कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाइए. राज्यपाल ने 21 फरवरी की रात ही करीब 10 बजे कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया. जगदंबिका पाल को आनन-फानन में यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई दी गई.


इस पूरे ऑपरेशन के दरम्यान राजभवन से लेकर शपथ लेने वाले लोग इतनी हड़बड़ी में थे कि शपथ ग्रहण के बाद रस्म के तौर पर होने वाला राष्ट्रगान भी नहीं पढ़ा गाय था. 22 फरवरी 1998 को लखनऊ समेत यूपी के कई संसदीय क्षेत्रों में वोटिंग हो रही थी. इधर अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी राज्यपाल रोमेश भंडारी के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए. 


बताया जा राह है कि राज्यपाल रोमेश भंडारी के इस फैसले से तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर नारायणन भी खुश नहीं थे. प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल को पत्र लिखकर लखनऊ के घटनाक्रम और उसमें रोमेश भंडारी की भूमिका पर राष्ट्रपति की भूमिका पर नाराजगी जताई थी.

लेकिन असली ड्रामा तो अब लखनऊ के सचिवालय में हो रहा था. सुबह-सुबह मुख्यमंत्री के चेंबर में जगदंबिका पाल जाकर जम गए. वहीं दूसरी तरफ बर्खास्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी पहुंच गए. लेकिन उनके सचिवालय पहुंचने का कोई फायदा नहीं था, क्योंकि उस वक्त संवैधानिक रूप से जगदंबिका पाल ही मुख्यमंत्री थे.


22 फरवरी को ही कल्याण सिंह सरकार में मंत्री रहे नरेन्द्र सिंह गौड़ ने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कल्याण सिंह सरकार को बहाल करने की मांग की. याचिका पर सुनवाई करते हुए 23 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जगदंबिका पाल की सरकार को अवैध करार दे दिया और कल्याण सिंह सरकार को बहाल करने का आदेश भी दे दिया.


हाईकोर्ट के इस आदेश के साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया था. लेकिन हाईकोर्ट ने फैसले के खिलाफ इस बार सुप्रीम कोर्ट जाने की बारी जगदंबिका पाल कैंप की थी. सुप्रीम कोर्ट ने कंपोजिट फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया. साथ ही कहा कि यह प्रक्रिया पूरी होने तक जगदंबिका प्रसाद और कल्याण सिंह दोनों को मुख्यमंत्री की तरह संम्मान दिया जाए. 


कंपोजिट फ्लोर टेस्ट का मतलब यह होता है कि दोनों मुख्यमंत्री एक साथ विश्वास प्रस्ताव रखेंगे और उसपर एकसाथ वोटिंग होगी. वोटिंग में जिसके साथ ज्यादा विधायक होंगे, उसे वोटिंग का नतीजा घोषित होने के समय से मुख्यमंत्री माना जाएगा.


26 मई की सुबह विधानसभा में कंपोजिट फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया शुरू हुई. शाम के वक्त 425 सदस्यों की विधानसभा में मुख्यमंत्री पद पर जगदंबिका पाल की दावेदारी खत्म हो चुकी थी. 225 विधायकों ने कल्याण सिंह के पक्ष में जबकि 196 विधायकों ने जगदंबिका पाल के पक्ष में वोट किया था. और इस तरह मायावती ने जो दिमाग लगाया वो सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद फेल हो गया और कल्याण सिंह फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी में बैठ गए.


इस घटनाक्रम के कुछ ही हफ्तों के बाद लोकसभा चुनाव का नतीजा आ गया. 16 मार्च 1998 को राष्ट्रपति के.आर नारायणन ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण दे दिया. और उधर लखनऊ में राज्यपाल रोमेश भंडारी लग गया थ कि अब उनकी विदाई तय है इसलिए उन्होंने खुद ही राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया. ये पहली ऐसी घटना है जब किसी राज्य में एक वक्त में दो मुख्यमंत्री थे. ऐसा कहा जाता है कि ये सिर्फ राज्यपाल रोमेश भंडारी के जल्दबाजी में लिए गए फैसले का परिणाम था. 

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